Panchmukhi

Tirth Yatra & Tours India

CHAR DHAM YATRA

Char Dham Yatra 14 Days / 13 Nights Uttarakhand Verified Pilgrimage Tour Tour Code: #62
प्रारंभिक मूल्य (Offer Price) ₹ 21500/- / व्यक्ति (All-Inclusive)
Sacred Pilgrimage Circuit & Covered Holy Shrines (6 Places)
01 1.)श्री केदारनाथ
02 2.)श्री बद्रीनाथ
03 3.)श्री हरिद्वार
04 4.)श्री यमुनोत्री
05 5.)श्री गंगोत्री
06 6.)श्री ऋषिकेश
Complete Temple Darshan & Holy Bathing Arrangements All-Inclusive Tour
What's Included in This Package
Hotel Stay
One Star Verified Clean Hotels
Pure Veg Meals
Morning Tea, Breakfast, Lunch & Dinner Included
Confirmed Travel
Special Express Train / Clean Coach Transfers
Tour Escort
Dedicated Panchmukhi Yatra Coordinator 24/7
All Darshans
Temple Entry Guidance & Local Sightseeing
Elderly Care
Special assistance for senior citizens & families
सीमित सीटें उपलब्ध

इस पावन यात्रा के लिए अपनी सीट सुरक्षित करें

एसी ट्रेन/वाहन, होटल, सात्विक भोजन एवं दर्शन गाइड सहित सम्पूर्ण व्यवस्था

Sacred Darshan Highlights & Holy Significance
1

श्री केदारनाथ

केदारनाथ: - ऐसी मान्यता है कि द्वापर काल में जब पांडवों ने महाभारत का युद्ध जीत लिया था. तब उन्हें इस बात की ग्लानि हो रही थी कि उन्होंने अपने भाइयों, सगे-संबंधियों का वध किया है. उन्होंने बहुत पाप किया है इसे लेकर वो बहुत दुखी रहा करते थे. इन पापों से मुक्ति के लिए पांडवों ने भगवान शिव के दर्शन के लिए काशी पहुंचे. लेकिन इस बात का पता जब भोलेनाथ को चला तो वो नाराज होकर केदारनाथ चले गए. फिर पांडव भी भोलेनाथ के पीछे-पीछे केदारनाथ पहुंच गए. फिर भगवान शिव ने पांडवों से बचने के लिए बैल का रूप धारण कर बैल की झुंड में शामिल हो गए. तब भीम ने अपना विराट रूप धारण कर दो पहाड़ों पर अपना पैर रखकर खड़े हो गये. सभी पशु भीम के पैरों के नीचे से चले गए, परंतु भगवान शिव अंतर्ध्यान होने ही वाले थे कि भीम ने भोलेनाथ की पीठ पकड़ ली. पांडवों की इस लालसा को देखकर शिव बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें दर्शन दिए. इसके बाद पांडव इस पाप से मुक्त हुए . इसके बाद पांडवों यहां पर केदारनाथ के मंदिर का निर्माण करवाया था. जिसमें आज भी बैल के पीठ की आकृति-पिंड के रूप में पूजा की जाती है.

2

श्री बद्रीनाथ

विष्णु पुराण में इस क्षेत्र से संबंधित एक अन्य कथा है, जिसके अनुसार धर्म के दो पुत्र हुए- नर तथा नारायण, जिन्होंने धर्म के विस्तार हेतु कई वर्षों तक इस स्थान पर तपस्या की थी। अपना आश्रम स्थापित करने के लिए एक आदर्श स्थान की तलाश में वे वृद्ध बद्री, योग बद्री, ध्यान बद्री और भविष्य बद्री नामक चार स्थानों में घूमे। अंततः उन्हें अलकनंदा नदी के पीछे एक गर्म और एक ठंडा पानी का चश्मा मिला, जिसके पास के क्षेत्र को उन्होंने बद्री विशाल नाम दिया।[4] यह भी माना जाता है कि व्यास जी ने महाभारत इसी जगह पर लिखी थी,[9] और नर-नारायण ने ही क्रमशः अगले जन्म में क्रमशः अर्जुन तथा कृष्ण के रूप में जन्म लिया था।[10] महाभारतकालीन एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। इसी कारण से बद्रीनाथ के ब्रम्हाकपाल क्षेत्र में आज भी तीर्थयात्री अपने पितरों का आत्मा का शांति के लिए पिंडदान करते हैं।

3

श्री हरिद्वार

हरिद्वार में त्रिदेव वास करते हैं, लेकिन मोक्ष की इस नगरी में ही एक शक्तिपीठ भी है जो सती के त्याग का गवाह है. यह शक्तिपीठ सती के शिव के प्रति प्रेम का भी गवाह है. हरिद्वार का माया देवी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां सती की नाभि गिरी थी. देवनगरी हरिद्वार में पतित पावनी गंगा भक्तों के पाप धोती है.

4

श्री यमुनोत्री

एक पौराणिक गाथा के अनुसार यह असित मुनि का निवास था। वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था। भूकम्प से एक बार इसका विध्वंस हो चुका है, जिसका पुर्ननिर्माण कराया गया। यमुनोत्तरी तीर्थ, उत्तरकाशी जिले की राजगढी(बड़कोट) तहसील में ॠषिकेश से251किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में तथा उत्तरकाशी से131किलोमीटरपश्चिम -उत्तर में 3185मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।यह तीर्थ यमुनोत्तरी हिमनद से5मील नीचे दो वेगवती जलधाराओं के मध्य एक कठोर शैल पर है।यहाँ पर प्रकृति का अद्भुत आश्चर्य तप्त जल धाराओं का चट्टान से भभकते हुए "ओम् सदृश "ध्वनि के साथ नि:स्तरण है।तलहटी में दो शिलाओं के बीच जहाँ गरम जल का स्रोत है,वहीं पर एक संकरे स्थान में यमुनाजी का मन्दिर है।वस्तुतः शीतोष्ण जल का मिलन स्थल ही यमुनोत्तरी है।(यमुनोत्तरी का मार्ग) हनुमान चट्टी (2400मीटर)यमुनोत्तरी तीर्थ जाने का अंतिम मोटर अड्डा है।इसके बाद नारद चट्टी,फूल चट्टी व जानकी चट्टी से होकर यमुनोत्तरी तक पैदल मार्ग है।इन चट्टीयों में महत्वपूर्ण जानकी चट्टी है,क्योंकि अधिकतर यात्री रात्रि विश्राम का अच्छा प्रबंध होने से रात्रि विश्राम यहीं करते हैं।कुछ लोग इसे सीता के नाम से जानकी चट्टी मानते हैं,लेकिन ऐसा नहीं है।1946में एक धार्मिक महिला जानकी देवी ने बीफ गाँव में यमुना के दायें तट पर विशाल धर्मशाला बनवाई थी,और फिर उनकी याद में बीफ गाँव जानकी चट्टी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।यहीं गाँव में नारायण भगवान का मन्दिर है।पहले हनुमान चट्टी से यमुनोत्तरी तक का मार्ग पगडंडी के रूप में बहुत डरावना था,जिसके सुधार के लिए खरसाली से यमुनोत्तरी तक की 4मील लम्बी सड़क बनाने के लिए दिल्ली के सेठ चांदमल ने महाराजा नरेन्द्रशाह के समय50000रुपए दिए।पैदल यात्रा पथ के समय गंगोत्री से हर्षिल होते हुए एक "छाया पथ "भी यमुनोत्तरी आता था।यमुनोत्तरी से कुछ पहले भैंरोघाटी की स्थिति है।जहाँ भैंरो का मन्दिर है।अनेक पुराणों में यमुना तट पर हुए यज्ञों का तथा कूर्मपुराण(39/9_13)में यमुनोत्तरी माहात्म्य का वर्णन है।केदारखण्ड(9/1-10)में यमुना के अवतरण का विशेष उल्लेख है।इसे सूर्यपुत्री,यम सहोदरा और गंगा- यमुना को वैमातृक बहने कहा गया है।ब्रह्मांड पुराण में यमुनोत्तरी को"यमुना प्रभव"तीर्थ कहा गया है।ॠग्वेद (7/8/19)मे यमुना का उल्लेख है।महाभारत के अनुसार जब पाण्डव उत्तराखंड की तीर्थयात्रा में आए तो वे पहले यमुनोत्तरी,तब गंगोत्री फिर केदारनाथ-बद्रीनाथजी की ओर बढ़े थे,तभी से उत्तराखंड की यात्रा वामावर्त की जाती है।हेमचन्द्र ने अपने "काव्यानुशान "मे कालिन्द्रे पर्वत का उल्लेख किया है,जिसे कालिन्दिनी(यमुना) के स्रोत प्रदेश की श्रेणी माना जाता है।डबराल का मत है कि कुलिन्द जन की भूमि संभवतः कालिन्दिनी के स्रोत प्रदेश में थी।अतः आज का यमुना पार्वत्य उपत्यका का क्षेत्र, जो रंवाई,जौनपुर जौनसार नामों से जाना जाता है,प्राचीनकाल में कुणिन्द जनपद था।"महामयूरी"ग्रंथ के अनुसार यमुना के स्रोत प्रदेश में दुर्योधन यक्ष का अधिकार था।उसका प्रमाण यह है कि पार्वत्य यमुना उपत्यका की पंचगायीं और गीठ पट्टी में अभी भी दुर्योधन की पूजा होती है।यमुना तट पर शक और यवन बस्तियों के बसने का भी उल्लेख है।काव्यमीमांसाकार ने 10वीं शताब्दी में लिखा है कि यमुना के उत्तरी अंचलों में जहाँ शक रहते हैं,वहाँ यम तुषार- कीर भी है।इस प्रकार यमुनोत्तरी धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रही।(तप्तकुण्ड व अन्य कुण्ड) यमुनोत्तरी पहुँचने पर यहाँ के मुख्य आकर्षण यहाँ के तप्तकुण्ड हैं।इनमें सबसे तप्त जलकुण्ड का स्रोत मन्दिर से लगभग 20फीट की दूरी पर है,केदारखण्ड वर्णित ब्रह्मकुण्ड अब इसका नाम सूर्यकुण्ड एवं तापक्रम लगभग195डिग्री फारनहाइट है,जो कि गढ़वाल के सभी तप्तकुण्ड में सबसे अधिक गरम है।इससे एक विशेष ध्वनि निकलती है,जिसे "ओम् ध्वनि"कहा जाता है।इस स्रोत में थोड़ा गहरा स्थान है।जिसमें आलू व चावल पोटली में डालने पर पक जाते हैं,हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की पार्वती घाटी में मणिकर्ण तीर्थ में स्थित ऐसे ही तप्तकुण्ड को "स्टीम कुकिंग"कहा जाता है।सूर्यकुण्ड के निकट दिव्यशिला है।जहाँ उष्ण जल नाली की सी ढलान लेकर निचले गौरीकुण्ड में जाता है,इस कुण्ड का निर्माण जमुनाबाई ने करवाया था,इसलिए इसे जमुनाबाई कुण्ड भी कहते है।इसे काफी लम्बा चौड़ा बनाया गया है,ताकि सूर्यकुण्ड का तप्तजल इसमें प्रसार पाकर कुछ ठण्डा हो जाय और यात्री स्नान कर सकें। गौरीकुण्ड के नीचे भी तप्तकुण्ड है।यमुनोत्तरी से 4मील ऊपर एक दुर्गम पहाड़ी पर सप्तर्षि कुण्ड की स्थिति बताई जाती है।विश्वास किया जाता है कि इस कुण्ड के किनारे सप्तॠषियों ने तप किया था।दुर्गम होने के कारण साधारण व्यक्ति यहाँ नहीं पहुँच सकता।स्थानीय लोगों का कहना है कि आजसे लगभग 60साल पहले विष्णुदत्त उनियाल वहाँ गए थे।लौटते समय उन्होंने वहाँ एक शिवलिंग देखा।जैसे ही वह उसे उठाने के लिए हुए वह गायब हो गया।

5

श्री गंगोत्री

पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान श्री रामचंद्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी। इस पवित्र शिलाखंड के निकट ही 18 वी शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण किया गया। ऐसी मान्यता है कि देवी भागीरथी ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया। ऐसी भी मान्यता है कि पांडवो ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गये अपने परिजनो की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ का अनुष्ठान किया था। यह पवित्र एवं उत्कृष्ठ मंदिर सफेद ग्रेनाइट के चमकदार 20 फीट ऊंचे पत्थरों से निर्मित है। दर्शक मंदिर की भव्यता एवं शुचिता देखकर सम्मोहित हुए बिना नहीं रहते। शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। यह दृश्य अत्यधिक मनोहार एवं आकर्षक है। इसके देखने से दैवी शक्ति की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। पौराणिक आख्यानो के अनुसार, भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओ को फैला कर बैठ गए और उन्होने गंगा माता को अपनी घुंघराली जटाओ में लपेट दिया। शीतकाल के आरंभ में जब गंगा का स्तर काफी अधिक नीचे चला जाता है तब उस अवसर पर ही उक्त पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते है।

6

श्री ऋषिकेश

हिमालय का प्रवेश द्वार,ऋषिकेश जहाँ पहुँचकर गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ आगे बढ़ जाती है। ऋषिकेश का शान्त वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है। उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊँचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से बहती गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है। ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। कहा जाता है कि इस स्थान पर ध्यान लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है। हर साल यहाँ के आश्रमों के बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं।

Boarding & Dropping Railway Stations

Devotees can board and deboard at any of the following confirmed junctions along the route:

Haridwar
Return journey dropping is conveniently arranged to your nearest selected junction.
Tour Itinerary Overview & Instructions
Boarding: Will Be Nearest Railway Junction.
Dropping: To Your Nearest Railway Junction.
CALL FOR MORE INFORMATION - 7440201045//7440201048
Booking, Cancellation & Refund Policies
Booking Terms
To Confirm Your Journey, It Is Mandatory To Book 20% Of The Amount Online On Www.panchmukhiyatra.com.  The Remaining 80% Amount Will Have To Be Paid Online At Www.panchmukhiyatra.com 30 Days Before The Journey.  It Will Be Mandatory To Make 100% Payment Before 30 Days.
Cancellation Policy
If You Cancel Your Trip For Any Reason, Then 20% Of The Full Amount Of The Trip Will Be Charged As Cancellation / Cancellation Charge, 50% Amount Will Not Be Refundable If The Trip Is Canceled / Canceled Before 15 Days Of The Date Of Travel.  And 75% Will Not Be Refundable If The Trip Is Canceled Before 7 Days.  And 100% Amount Will Not Be Refundable If The Trip Is Canceled Before 2 Days Of The Date Of Travel.
Refund Policy
Any Refund Will Be Done Within A Week.
100% Verified Pilgrimage

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सुगम एवं सुरक्षित दर्शन यात्रा - पंचमुखी तीर्थ यात्रा परिवार के साथ

Uttarakhand Special Tour

CHAR DHAM YATRA

Duration 14D / 13N
Tour Type Devotee Group
Special Offer Tour Fare All-Inclusive
Sleeper
₹ 21500
Per Devotee
3Ac
₹ 29500
Per Devotee
2Ac
₹ 35500
Per Devotee
Includes Train Fare, Veg Food, Hotel & Transfers
Upcoming Departure Dates (Select Date)
01 Sep To 14 September 2026 Available
06 Sep To 19 September 2026 Available
09 Sep To 22 September 2026 Available
 21 Sep To 04 October 2026 Available
25 Sep To 08 October 2026 Available
Share Tour With Family:
100% Pure Veg Meals
Verified Safe Hotels
Dedicated Tour Guide
Govt. Registered Agency
Need Help Planning?
Have special requirements for elderly pilgrims, or need customized boarding stations? Speak directly with our head yatra coordinators.
+91 7440201045 +91 7070999026
Why Pilgrims Trust Panchmukhi Yatra?
  • 15+ years of spiritual yatra experience
  • Over 50,000+ satisfied devotees served
  • Special care and priority for elderly citizens
  • Transparent pricing with 0 hidden charges
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